रायगंज विश्वविद्यालय में सप्ताहव्यापी अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का समापन
रायगंज: नृत्य, संगीत और कविता की मधुर छटा के बीच रायगंज विश्वविद्यालय में आयोजित सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का भव्य समापन हुआ। विश्वविद्यालय परिसर स्थित प्रिय रंजन दासमुंशी मेमोरियल हॉल में आयोजित इस कार्यशाला का मुख्य विषय “अनुसंधान पद्धति एवं पांडुलिपि विज्ञान” रहा।संस्कृत एवं बंगला विभाग के संयुक्त तत्वावधान में तथा IQAC के सहयोग से आयोजित यह कार्यशाला 20 जनवरी से प्रारंभ होकर सफलतापूर्वक संपन्न हुई।समापन समारोह की शुरुआत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दीपक कुमार राय के संबोधन से हुई। उन्होंने इस प्रकार की अकादमिक एवं अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों को विश्वविद्यालय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।

ऑनलाइन माध्यम से कार्यक्रम से जुड़े प्रख्यात शिक्षाविद एवं पूर्व कुलपति प्रो. सौरेन बंद्योपाध्याय ने विशेष वक्तव्य प्रस्तुत किया।इस अवसर पर डीन प्रो. प्रदीप दास महापात्र, प्रो. नूरजहान कासेमी, प्रो. देवाशीष विश्वास, प्रो. स्वपन कुमार माल, प्रो. अतनु आड्डा, समीर मंडल सहित अनेक वरिष्ठ शिक्षक एवं अतिथि उपस्थित रहे।कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागी विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।IQAC निदेशक प्रो. प्रशांत कुमार महला ने कार्यशाला के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा—“वर्तमान समय में शोधकर्ताओं को केवल पारंपरिक शोध पद्धतियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें तकनीक-आधारित और डिजिटल रूप से दक्ष होना आवश्यक है।”उन्होंने प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया अभियान का उल्लेख करते हुए बताया कि इस कार्यशाला में ऑफलाइन के साथ-साथ ऑनलाइन प्रशिक्षण पर भी विशेष जोर दिया गया। प्राचीन ज्ञान-संपदा के वैज्ञानिक संरक्षण एवं आधुनिक अनुसंधान पद्धतियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना इस आयोजन का प्रमुख लक्ष्य रहा।इस कार्यशाला में पश्चिम बंगाल के अलावा बांग्लादेश, बिहार, दिल्ली और बनारस सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए शोधकर्ताओं ने भाग लिया।

विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि—इस पहल से देश-विदेश के शोधकर्ता रायगंज विश्वविद्यालय की शोध सुविधाओं से परिचित होंगे।भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोधकर्ताओं के आगमन का मार्ग प्रशस्त होगा।आगामी NAAC मूल्यांकन के लिए यह अंतरराष्ट्रीय प्रयास विश्वविद्यालय को विशेष बढ़त प्रदान करेगा।शोधार्थियों की प्रतिक्रियाकार्यशाला में शामिल शोधार्थियों ने इसे अत्यंत उपयोगी बताया। उनका कहना है कि संस्कृत एवं বাংলা की प्राचीन पांडुलिपियों के पाठ, संरक्षण एवं वैज्ञानिक अध्ययन की व्यावहारिक जानकारी ने उनके शोध कार्य को नई दिशा और व्यापक दृष्टिकोण प्रदान किया है।
